कंपनियां सामाजिक कामों के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपए खर्च करती हैं। इसे कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी यानी सीएसआर कहा जाता है।
हिंदू बिजनेस लाइन में एक लेख छपा है। इस लेख के मुताबिक 2024-25 में कंपनियों ने करीब 40,794 करोड़ रुपए सीएसआर पर खर्च किए। देश की 30 हजार से ज्यादा कंपनियां सीएसआर पर खर्च करती हैं।
लेकिन समस्या यह है कि इस पैसे का बड़ा हिस्सा उन राज्यों में जा रहा है जो पहले से ही ज्यादा अमीर और विकसित हैं।
यानी जिस राज्य की हालत अच्छी है, वहां सीएसआर का पैसा ज्यादा पहुंच रहा है और गरीब राज्यों को कम मिल रहा है।
शिक्षा में भी यही हाल है। सीएसआर के कुल पैसे का करीब 34 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च हुआ। लेकिन बिहार जैसे गरीब और शिक्षा में पिछड़े राज्य को बहुत कम पैसा मिला, जबकि दिल्ली जैसे बेहतर स्थिति वाले राज्य को कई गुना ज्यादा पैसा मिला।
ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कंपनियां आमतौर पर अपने कारखानों और दफ्तरों के आसपास ही सीएसआर का पैसा खर्च करना पसंद करती हैं। उद्योग ज्यादातर अमीर राज्यों में हैं, इसलिए पैसा भी वहीं ज्यादा जाता है।
सीएसआर का मकसद सिर्फ पैसा खर्च करना नहीं होना चाहिए। पैसा वहां पहुंचना चाहिए जहां जरूरत सबसे ज्यादा है। सरकार को पिछड़े इलाकों में पैसा लगाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहित करना चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि सीएसआर के पैसे से लोगों को वास्तव में कितना फायदा हुआ।