मेरे एक साथी हैं, टीवी पर ठाकरे की मौत की खबरें देखकर उत्साहित हैं, कह रहे हैं कि जब मराठियों की बात करने वाले को देश इस तरह सम्मानित कर रहा है तो मैं भी बिहारियों का पक्ष ले कर लाठी डंडा उठा लेता हूं और एक फौज तैयार कर लेता हूं । और जो लोग ठाकरे को हिंदू वादी बता रहे हैं तो वे लोग ये बताएं कि क्या बिहारी या दक्षिण भारतीय हिंदू नहीं है। ऐसा नहीं है कि ठाकरे की मौत का मुझे दर्द नहीं है , लेकिन दर्द इस बात का है कि ठाकरे की मौत के साथ उनकी क्षेत्रवादी राजनीति का अंत नहीं हो रहा है, बल्कि मीडिया उनका उत्तराधिकारी ढूंढ रहा है।
रविवार, 18 नवंबर 2012
शनिवार, 6 अक्टूबर 2012
वढेरा की किस्मत और हमारी बदकिस्मती
मेरा एक दोस्त है, लंगोटिया , जब हम जवान हो रहे थे तो उसकी एक इच्छा थी कि किसी तरह उसका विवाह प्रियंका गांधी से हो जाए, पता नहीं कि उसकी यह इच्छा मुझे बडी अजीब लगती थी, लेकिन अब समझ में आया कि वह प्रियंका से शादी क्यों करना चाहता था, काश उसकी शादी हो जाती तो एक दोस्त होने के नाते मेरे पास भी एक अच्छा खासा फ़लैट होता, काश वढेरा की जगह मेरा दोस्त होता , बदकिस्मती मेरी और उसकी भी
सोमवार, 20 अगस्त 2012
अमीरों पर मेहरबान सरकार
केंद्र सरकार दिल्ली के सुपर रिच यानी महा अमीर लोगों पर मेहरबान होने जा रही है। इन लोगों द्वारा खेती बाडी की जमीन पर बनाए गए डाक बंगला नुमा कोठियों को मंजूरी दी जा रही है। वैसे अगर कोई गरीब आदमी किसी प्रापर्टी डीलर झांसे में आ कर खेती बाडी की जमीन पर कोई छोटो मोटा प्लाट ले लेता है तो उसे अवैध बता कर गिरा दिया जाता है, लेकिन सालों से ऐसी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे मोटे सेठ को रियायत की तैयारी पूरी हो गई है। दिलचस्प बात यह है कि गरीबों के आवास या हरियाली की फिक्र कर रहे एनजीओ की चुप्पी इस पॉलिसी में क्या खामिया हैं, इस पर मेरी एक रिपोर्ट
कई खामियां हैं फार्म हाउस पॉलिसी में
राजू सजवान, नई दिल्लीदिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा पास की गई फार्म हाउस पॉलिसी में कई खामियां हैं। यह पॉलिसी टाउन प्लानिंग के नियमों के मुताबिक नहीं हैं। दिलचस्प बात यह है कि डीडीए के कई अधिकारी इसके पक्ष में हैं, लेकिन वे खुलकर इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं।
अब तक दिल्ली में कम से कम ढाई एकड़ जमीन पर ही फार्म हाउस निर्माण की इजाजत थी। वह भी कुल क्षेत्रफल का एक फीसद। यानी यहां केवल चौकीदार या देखरेख के लिए छोटा सा कमरा बनाने की ही इजाजत थी, लेकिन पिछले दिनों हुई डीडीए की बोर्ड बैठक के बाद एक एकड़ जमीन पर 15 फीसद एफएआर की इजाजत देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है। डीडीए ने इसे कंट्री होम का नाम दिया है।
टाउन प्लानिंग का नियम कहता है कि जब कृषि योग्य भूमि पर रहने की इजाजत दी जाती है तो उस भूमि का चेंज आफ लैंड यूज (भू उपयोग परिवर्तन) कराना होता है। दिल्ली के भवन उपनियमों के मुताबिक प्लाट का सबडिविजन भी नहीं होता। प्रस्तावित फार्म हाउस पॉलिसी के मुताबिक इस इलाके में नौ मीटर चौड़ी सड़कें होंगी, लेकिन किसी भी टाउन शिप में 18 मीटर चौड़ी सड़कें होनी चाहिए, ताकि वहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट आसानी से आ जा सके।
जानकार बताते हैं कि फार्म हाउस पॉलिसी बनाने से पहले यह तय किया जाना चाहिए था कि इस इलाके में बिजली-पानी-सीवर जैसी सेवाएं कौन ओर कैसे देगा। टाउन प्लानिंग के नियम के मुताबिक किसी भी कालोनी में लगभग 40 फीसदी हिस्सा सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए होता है, इसमें रोड, सीवर, पानी, अस्पताल, पुलिस स्टेशन, अग्निशमन जैसी सेवाएं शामिल की जाती है।
एक परिवार बनाम 200 परिवार
डीडीए के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि देश भर में जहां कम आय वर्ग के लिए मकान (एलआईजी) बनाने की योजना बन रही हैं, वहीं दिल्ली में कंट्री होम की अवधारणा को बढ़ावा दिया जा रहा है। कंट्री होम यानी एक एकड़ जमीन पर जहां एक परिवार को बसाया जाना है, वहां एलआईजी फ्लैट बना कर लगभग 200 परिवारों को बसाया जा सकता है।हरित क्षेत्र को होगा नुकसान
इस अधिकारी के मुताबिक दुनिया भर में ऊध्र्वाकार विकास की ओर ध्यान दिया जा रहा है, ताकि कम से कम जमीन का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन दिल्ली में कृषि योग्य भूमि पर बसाया जा रहा है। दिल्ली में अभी 11 हजार हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि जिसे हरित क्षेत्र माना जाता है, लेकिन फार्म हाउस पॉलिसी के बाद हरित क्षेत्र को सबसे अधिक नुकसान होगा।गुरुवार, 16 अगस्त 2012
आज सुबह लोकल ट्रेन से आते वक्त ओखला रेलवे स्टेशन पर एक बच्चे को पानी की थैलियों से भरे एक बैग को कंधे में रख कर इधर से उधर भागते देखा। बैग इतना भ्ारा था कि मुंह से आह निकल गई और चार पंक्तियां भी -
पीठ इसकी भी झुकी है
और उसकी भी
फर्क इतना है कि
उसके कंधों पर किताबों का बोझ है
और इसके कंधों पर
अपने परिवार का
उसका बोझ तो शायद उसका भविष्य बना दे
लेकिन इसका भविष्य
इस बोझ तले दबना तय है .....
पीठ इसकी भी झुकी है
और उसकी भी
फर्क इतना है कि
उसके कंधों पर किताबों का बोझ है
और इसके कंधों पर
अपने परिवार का
उसका बोझ तो शायद उसका भविष्य बना दे
लेकिन इसका भविष्य
इस बोझ तले दबना तय है .....
शनिवार, 11 अगस्त 2012
प्राइवेट कंपनी पर होगी जल बोर्ड की मेहरबानी
दिल्ली जल बोर्ड दिल्ली में पानी के निजीकरण की पूरी तैयारी कर चुका है। निजी कंपनी को कैसे कैसे फायदा पहुंचाया जाएगा, इसकी एक बानगी देखिये कि निजी कंपनी को कोई नुकसान न हो, इस लिए पाइप बिछाने का सारा खर्च जल बोर्ड करेगा और पूरे इलाके की पाइप लाइन बदली जाएगी। दिल्ली सरकार की साजिश की परत खोलती मेरी दो रिपोर्ट
अब तक पानी की पाइप लाइन से कनेक्शन लेने के लिए आपको मीटर तक पाइप बिछाने का खर्च जल बोर्ड को देना होता है, लेकिन मालवीय नगर, वसंत विहार और महरौली में उपभोक्ताओं के घर के मीटर तक पाइप लाइन तो बदली जाएगी, पर उसका पैसा उपभोक्ता से नहीं लिया जाएगा।
ऐसा इसलिए किया जाएगा, ताकि पानी की लीकेज से होने वाले राजस्व के नुकसान को कम किया जा सके। जल बोर्ड का मानना है कि इन इलाकों में पानी की आपूर्ति मांग से अधिक हो रही है, लेकिन लीकेज और पानी की चोरी के कारण कई इलाकों में लोगों को पानी नहीं मिल पाता।
अब जब जल बोर्ड ने इन इलाकों में पानी का वितरण निजी कंपनियों को सौंपने का निर्णय ले लिया है, जो लोगों को सातों दिन 24 घंटे पानी सप्लाई करेगी। यह तभी संभव है कि जब पानी की लीकेज रोकी जाएगी। यही वजह है कि जल बोर्ड जमीन के नीचे डाली गई जीआई पाइप बदलने का निर्णय लिया है। यह जीआई पाइप जमीन के नीचे सड़ गल जाता है, इसकी जगह एमडीबी पाइप लाइन डाली जाएगी, इस पाइप की उम्र 50 साल है।
जल बोर्ड अधिकारियों का कहना है कि लीकेज खत्म होने के बाद हर उपभोक्ता के घर आधुनिक मीटर लगाए जाएंगे। इसके बाद लाइन लॉस काफी कम हो जाएगा और लोगों को 24 घंटे सातों दिन पानी मिलने लगेगा।
इतना ही नहीं, जल बोर्ड घरों के अंदर की लीकेज की भी जांच करेगा। बोर्ड अधिकारियों का कहना है कि नागपुर और हुबली (कर्नाटक) में जहां 24 घंटे पानी दिया जाता है, वहां सबसे पहले लोगों ने शिकायत की कि उनका बिल काफी अधिक आ रहा है, जब जांच की गई तो पाया लगभग 20 फीसद घरों के अंदर पानी लीक होता है, इसलिए वे घरों में पानी की लीकेज की जांच निशुल्क करेंगे।
बोर्ड अधिकारियों ने बताया कि लोगों की शिकायत रहती है कि जल बोर्ड पाइप लाइन बिछा देता है, लेकिन उसके बाद सड़कें ठीक नहीं की जाती, क्योंकि यह काम दिल्ली नगर निगम को करना होता है, परंतु इन तीनों इलाकों में जल बोर्ड ही सड़कों का पुनर्निर्माण करेगा। इस तरह की विशेष व्यवस्था की गई है।
इन सबका मकसद यह है कि प्राइवेट कंपनी को ऐसी व्यवस्था दी जाए, ताकि उसे पर्याप्त पानी मिल सके और वह उपभोक्ताओं को 24 घंटे पानी दे सके।
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महंगाई के साथ साथ बढ़ेगा पानी का बिल!
पानी के वितरण में निजी भागीदारी (पीपीपी) अपनाने के बाद संभव है कि लोगों को महंगाई दर के हिसाब से पानी की कीमत चुकानी पड़े। दिल्ली में अपनाए जा रहे नागपुर मॉडल के मुताबिक पानी का वितरण कर रही कंपनी महंगाई दर में हो रहे बदलाव के आधार पर अपने शुल्क में वृद्धि करवा सकती है।
नागपुर में पेयजल व्यवस्था नागपुर नगर निगम के पास है, जिसने ओरेंज सिटी वाटर लिमिटेड को पानी के वितरण का काम सौंपा हुआ है। करार के मुताबिक नागपुर नगर निगम निजी कंपनी को बतौर ऑपरेशन एंड मेंटीनेंस (ओएंडएम) शुल्क के रूप में आठ रुपये प्रति किलोलीटर की दर से भुगतान करेगा।
नागपुर नगर निगम की इंजीनियरिंग कंसलटेंट कंपनी डीआरए कंसलटेंटस प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक दिनेश राठी के मुताबिक करार में यह भी स्पष्ट है कि भारतीय रिवर्ज बैंक द्वारा निर्धारित महंगाई दर के आधार पर ओएंडएम शुल्क में वृद्धि हो जाएगी। हालांकि लोगों से वसूले जाने वाले पेयजल शुल्क पर इसका कोई असर तब तक नहीं पड़ेगा, जब तक नागपुर नगर निगम कोई फैसला न ले ले। दिनेश राठी ही दिल्ली के मालवीय नगर प्रोजेक्ट के कंसलटेंट भी है, लेकिन उन्होंने दिल्ली में होने वाले करार के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।
इस मामले में दिल्ली जल बोर्ड का कहना है कि लोगों से वसूले जाने वाले पेयजल शुल्क का निर्धारण जल बोर्ड ही करेगा और ऑपरेटर (निजी कंपनी) को भुगतान जल बोर्ड करेगा। जानकारों का कहना है कि यह सही है कि प्राइवेट कंपनी के शुल्क में महंगाई दर के मुताबिक वृद्धि का सीधा असर लोगों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन संभव है कि ऑपरेटर का शुल्क बढऩे पर जल बोर्ड लागत बढऩे का तर्क देकर लोगों से वसूले जाने वाले पेयजल शुल्क में वृद्धि कर दे, क्योंकि ऐसा ही बिजली कंपनियां और दिल्ली बिजली नियामक आयोग ने भी किया है।
इतना ही नहीं, आपरेटर को जो भी पैसा दिया जाएगा, वह जल बोर्ड का होगा, यानी जल बोर्ड द्वारा किसी न किसी मद के माध्यम से जनता द्वारा इक_ा किया गया पैसा ही आपरेटर को दिया जाएगा।
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निजी कंपनी को 10 रुपये और पब्लिक को दो रुपये
दिल्ली में पानी के पीपीपी प्रोजेक्ट का गहन अध्ययन कर रही संस्था वाटर सिटीजन्स फ्रंट फॉर वाटर डेमोक्रेसी के संयोजक एस.ए. नकवी बताते हैं कि जल बोर्ड ने निजी कंपनी को 10.64 रुपये प्रति किलोलीटर का भुगतान करेगा, जबकि जनता को दो रुपये प्रति किलोलीटर की दर से दिया जाता है। इसके अलावा निजी कंपनी को दो साल तक बिजली पानी और अन्य सेवाएं मुफ्त देने का भी प्रावधान है।
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दिल्ली की गुलाबी तस्वीर के पीछे का सच
---कांग्रेस शासन काल में भूख और गरीबी से मारे गए 737 लोग

बेशक दिल्ली सरकार के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय 1 लाख 76 हजार रुपये (लगभग 482 रुपये रोजाना) सालाना है, लेकिन इस गुलाबी तस्वीर के पीछे की सच्चाई यह है कि हर सप्ताह एक व्यक्ति देश की राजधानी में भूख या गरीबी से दम तोड़ रहा है। दिलचस्प यह है कि दिल्ली को अंतर्राष्ट्रीय शहर बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस सरकार के 14 साल के शासन काल में 737 लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल काल का ग्रास बन चुके हैं।
यह खुलासा हुआ है, सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत मिले एक जवाब से। सीलमपुर निवासी नैय्यर आलम ने दिल्ली पुलिस से पूछा था कि 1999 से लेकर अब तक कितने लोगों ने भूख से तंग होकर आत्महत्या की या भूख के कारण उनकी मौत हुई। आलम ने इसी तरह गरीबी के कारण आत्महत्या या मौत के आंकड़े भी पुलिस से मांगे।
पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों से ये आंकड़े मंगाए और जब जवाब जून 2012 में आलम को मिला तो वह चौंकाने वाला था। पिछले साल वर्ष 2011 में दिल्ली में भूख और गरीबी से मरने वालों की संख्या 62 थी। इसमें से 15 लोगों ने भूख और 47 लोगों ने गरीबी के कारण दम तोड़ा। वर्ष 2012, मार्च तक मरने वालों की संख्या 11 हैं।
इस तरह वर्ष 2010 में भूख से 18 और गरीबी से 40 लोगों ने दम तोड़ा। दिलचस्प बात यह है कि अक्टूबर 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के कारण दिल्ली पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनी हुई थी और दिल्ली व केंद्र सरकार दिल्ली में हुए विकास का जमकर ढिंढोरा पीट रही थी, लेकिन इस साल भूख और गरीबी से हुई मौतों के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा।
इससे पहले वर्ष 2009 में भी भूख और गरीबी से 60 लोग मारे गए थे। हालांकि वर्ष 2008 में यह आंकड़ा कुछ कम था और भूख गरीबी से मरने वालों की संख्या 39 रिकार्ड की गई। वर्ष 2005 और 2002 में सबसे अधिक 72 मौतें हुई, जबकि वर्ष 2001 में सबसे कम 37 लोगों की मौत हुई।
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पुलिस के आंकड़े संदेहास्पद
हालांकि नैय्यर आलम को उपलब्ध कराए गए पुलिस के आंकड़े भी पूरा सच नहीं हैं। उनको उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक इन 15 सालों में अकेले पश्चिमी जिले में 689 मौतें गरीबी और भूख से हुई, जबकि बाहरी जिले में 40 मौते, उत्तरी जिले में दो मौतें और पूर्वी जिले में चार मौतें हुई। अन्य जिलों के पुलिस अधिकारियों ने अपने जिले में भूख और गरीबी से मरने वालों की संख्या शून्य बताई है। आलम कहते हैं कि उन्हें संदेह पुलिस विभाग ने सूचना छिपाई है और पूरे आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए।
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पिछले 14 साल में भूख और गरीबी से हुई मौतें
वर्ष 2012 मार्च तक 11 मौतें
वर्ष 2011 में 62
वर्ष 2010 में 58
वर्ष 2009 में 60
वर्ष 2008 में 39
वर्ष 2007 में 52
वर्ष 2006 में 44
वर्ष 2005 में 72
वर्ष 2004 में 43
वर्ष 2003 में 44
वर्ष 2002 में 72
वर्ष 2001 में 37
वर्ष 2000 में 52
वर्ष 1999 में 55
थोड़ा सा चूके तो गायब हो जाती है आपकी रसोई
अप्रैल 2008 में शुरू हुआ भूख मुक्त दिल्ली अभियान गति नहीं पकड़ पाया है। यही वजह है कि इस अभियान के तहत अभी तक मात्र 13 आप की रसोई केंद्र ही चल रहे हैं। इन केंद्रों पर भी भूखे व्यक्ति की थोड़ी सी चूक उसे दिन भर के लिए भूखा रहने को मजबूर कर देती है। जागरण ने शुक्रवार को दिल्ली सरकार की इस महत्वकांक्षी योजना की पड़ताल करने के लिए अलग अलग केंद्रों का दौरा किया।
अप्रैल 2008 में निजामुद्दीन बस्ती में पहली आपकी रसोई केंद्र का उद्घाटन किया था मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने। जागरण टीम जब खोजते खोजते इस जगह पहुंची तो कुछ पुराने लोगों ने बताया कि हां, दीक्षित ने यहीं एक कार्यक्रम में गरीबों को खाना खिलाने का वादा किया था। कुछ माह तक इस जगह एक गाड़ी आकर इलाके के गरीबों को खाना खिलाती थी, लेकिन चार-पांच माह बाद यह गाड़ी आना बंद हो गई और इलाके के गरीब अब कुछ दयावान लोगों के रहमो-करम पर अपना पेट भरते हैं।
शाहदरा जीटी रोड पर पौने एक बजे पहुंची। वहां दर्जनों लोग आपकी रसोई वैन का इंतजार कर रहे थे। इन लोगों ने बताया कि वैन का कोई निर्धारित समय नहीं है, इसलिए कई दफा इधर-उधर होने के कारण उन्हें खाना नहीं मिल पाता। लगभग सवा दो बजे वैन आई और देखते ही देखते वहां गरीब लोगों की लाइन लग गई।
इन गरीबों को जो खाना दिया जा रहा था, उसे देख कर जागरण संवाददाता भौंचके रह गए। पीली दाल ऐसी कि डालते ही पत्तल पर फैल गई। चावल गीले, आलू की सब्जी और रोटी। लेकिन गरीबों के लिए यह अन्न भी कम नहीं था। थोड़ी देर में ही गाड़ी में आए लोग खाना बांट कर चलते बने। उन्होंने बताया कि खाना नजफगढ़ में बना कर यहां लाया जाता, यानी लगभग 40 किलोमीटर दूर से। संवाददाता ने जब पूछा कि खाना खराब नहीं होता तो वैन में आए लोगों ने बस इतना कहा कि खाना कभी खराब नहीं होता।
मंगोलपुरी आर -ब्लाक और आजादपुर स्थित रैन बसेरे पर पहुंची। लोगों ने बताया कि कि खाने की गुणवत्ता भी सही नहीं होती है। चावल रोटी व पतली दाल के अलावा कभी उन्हें कुछ नहीं मिलता है। खाने की गाडिय़ों के आने का समय का भी कोई निश्चित नहीं होता। गाडिय़ों के इंतजार में उन्हें काम छोडऩा पड़ता है।
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लोगों ने कहा कि
'दिन में जो खाना मिलता है, उसी में थोड़ा बचाकर रात के लिए रख लेते हैं। लेकिन जब दिन के खाने से कुछ नहीं बचता है तो रात में उनके सामने भूखे सोने के सिवा कोई चारा नहीं बचता है।Ó
मुकेश चौहान, मंगोलपुरी रैन बसेरा में रहने वाला मजदूर
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'कभी कभी काम नहीं मिलने के कारण उनके पास पैसे भी नहीं होते हैं, जिससे वह बाजार से खाना खरीद कर खाये। ऐसे में उसे कई बार भूखे पेट सोना पड़ता है। Ó
धर्मेंद्र, रोहिणी सेक्टर 26 के रैन बसेरा में रहने वाला मजदूर
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13 केंद्रों पर बंटता है खाना
मुख्यमंत्री के अतिरिक्त सचिव (भागीदारी प्रकोष्ठ) कुलानंद जोशी ने बताया कि अभी 13 केंद्रों पर आपकी रसोई के तहत गरीबों को खाना खिलाया जाता है। इसमें से सात इस्कॉन और छह अक्षयपत्रा संगठनों को सौंपे गए हैं। ये संगठन सीधे कारपोरेट समूह से एक साल की वित्तीय मदद के रूप में 14 लाख रुपये (जो एक केंद्र का खर्च है) ले लेते हैं और आज तक किसी भी केंद्र से किसी तरह की शिकायत नहीं आती है। सरकार की ओर से इन केंद्रों पर नजर रखी जाती है। उन्होंने कहा कि बारापुला एलिवेटिड रोड का निर्माण कार्य शुरू होने के कारण निजामुद्दीन बस्ती वाला केंद्र बंद किया गया है और प्रयास किए जा रहे हैं कि कुछ अन्य कारपोरेट समूहों को जोड़ कर आपकी रसोई केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए।
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